Ram Nagina Maurya Kee 23 Chayanit Kahaniyan
राम नगीना मौर्य की 23 चयनित कहानियां
राम नगीना मौर्य
रश्मि प्रकाशन
“राम नगीना मौर्य” देश के हिंदी साहित्य जगत में, ख्यातिलब्ध साहित्यकारों में प्रमुखता एवं सम्मान से लिया जाने वाला नाम है, जिनकी रचनाओं को किसी परिचय की दरकार नहीं है। किस पत्र या पत्रिका में उनकी रचना प्रकशित नहीं हुयी यह पता करना भूसे में सुई ढूँढने के समान ही होगा। उनके कई साझा संकलन, कहानी संग्रह प्रकाशित हुए एवं निर्विवादित रूप से वे स्वयम लेखन कला का एक गुरुकुल है। राज्य एवं राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न पुरुस्कारों द्वारा नवाज़े जा चुके हैं। उनकी कहानियां विभिन्न देशकाल, स्थितियों,तजुर्बों, स्मृतियों एवं जीवन के संघर्षों से उपजी हैं। जीवन में जो भिन्न भिन्न किरदार व्यक्ति जीता है एवं जिसके अनुसार उस की भूमिकाये बदलती हैं उनका बहुत ज्यादा प्रभाव कहानियों पर है। उन्होंने दैनिक जीवन कि आम उपेक्षित सी घटनाओं या बेहतर होगा उसे बातें ही कहा जाये, को एक निश्चित परिप्रेक्ष्य एवं कलात्मक आधार दिया है एवं उनकी कहानिया आम जन के परिवेश से स्वयं को चुनती हैं और उन्हीं में से अपने पात्र। उनके पात्र परिवेश में कहीं भी आयतित नहीं हैं, साथ ही उनके संवाद भी आम जन कि बोलचाल कि भाषा के संवाद हैं।
उनकी कहानियों में पात्रों के संवाद उसी भाव भूमि से लिए जाते हैं जिस भाव-भूमि में घटना है या जहाँ का वह सम्बंधित वाक्य है एवं यही कारण है कि पाठक पूर्णतः उनकी कहानी में अनुस्यूत हो जाता है। समीक्षाधीन पुस्तक उनकी अब तक प्रकशित श्रेष्ठ कहानियों का संग्रह है, कहानियां आम जिंदगी कि कहानियां है, उनके पात्र सामान्य होते हुए भी विशिष्ट है क्यूंकि आम तौर पर उन के विषय में भी कुछ लिखा जा सकता है यह अन्य समकालीन साहित्यकारों एवं अन्य कहानीकारों कि सोच से ऊपर है, उन के लिए तो वे मात्र जन समुदाय या अधिक स्पष्ट कहें तो भीड़ या झुण्ड हैं मौर्य जी उपेक्षित, परित्यक्तों एवं पिछड़ों के कथाकार हैं उनकी कथाओं के नायक एवं अन्य पात्र वे निम्न माध्यम वर्गीय लोग ही हैं। वे समाज के मध्यमवर्गीय एवं निम्न मध्यमवर्गीय परिवारों कि कहानियां प्रमुखता से लिखते हैं। कैसे वह मध्यम या निम्न मध्यम वर्ग का व्यक्ति अपने जीवन में अन्दर बाहर जूझ रहा है उसके तजुर्बे, एहसास, दर्द और तकलीफों से झूझ रहा है वही उनके अन्वेषण का प्रमुख विषय होता है एवं इस सूक्ष्म अन्वेषण तथा अवलोकन के चलते हासिल कुछ सूक्ष्म एवं अन्य जन हेतु मामूली और अनदेखे किये गए विषयों को सुन्दरता से उकेरते है एवं उनके जीवन कि जटिलताओं एवं मुश्किलात को सुलझाते हुए अक्सर उन्ही में डूबे हुए नज़र आते है। हमारी आपकी रोज़मर्रा कि जिंदगी कि हर छोटी ख़ुशी पाने कि बड़ी ज़द्दोज़हद को बहुत सुन्दर शब्द दिए है। कथानक की भाषाशैली सामान्य जन जीवन कि रोज़मर्रा की भाषा है एवं क्यूंकि कहानियां यथार्थ के बेहद करीब हैं अतः जन सामान्य बहुत सुगमता से स्वयं को उन से सम्बद्ध कर लेता है।
उनकी कहानियां समाज में जो भी घटित हो रहा है उस स्थिति एवं परिवेश को पूर्णतः सम्पूर्णता में समेटती है। छोटे से छोटी बात पर भी वे पूरा किस्सा गढ़ देते है एवम उस के ज़रिये हमें कटु यथार्थ का सरल किन्तु सटीक चित्रण देखने मिलता है। व्यक्ति, घर परिवार,समाज सभी के बीच में वह स्वयं को रख कर उन्ही का अंग बन कर अपने अनुभवों को कथानक रूप में प्रस्तुत करते हैं। उनकी कहानी पढ़ सहज ही स्पष्ट हो जाता है कि उनकी सोच, अध्ययन एवं अनुसन्धान कितना व्यापक एवं गहराई लिए हुए है एवं उनका घटनाओं को देखने का नजरिया एक आम कथाकार से कितना भिन्न है। वे,अनदेखे किये गए विषय पर भी विस्तृत, सुन्दर एवं रोचक कथानक रचने में माहिर हैं, जिनमें पात्र जैसा है, जहाँ है और जिस हाल में है वही चित्रण है कोई अलंकरण या सजावट नहीं है कहानियां परिस्थिति विशेष पर लिखी गयी है, औपचारिकता से कोसों दूर, सत्यता एवं वास्तविकता से जुडी हुयी हैं एवं इस तरह के कथानक को शब्द रूप में गढ़नें में उनका कोई सानी नहीं है, वे अपनी कहानियों में विभिन्न भाषाओं का प्रयोग बड़ी ही खूबसूरती से करते है, मूलतः क्षेत्रीय भाषाओँ को तो बहुत ही प्रमुखता से कथानक में पिरो देते हैं। कुछेक तथाकथित क्लिष्ट शब्दों को भी प्रयोग करते है। संभवतः ऐसे अल्प प्रयुक्त लुप्तप्राय शब्दों को प्रयोग के द्वारा पुनः प्रचलन में लाना ही उनका उद्देश्य है।
विभिन्न विचारकों के उध्दरण एवं प्रसिद्ध कवियों लेखकों की कविता, लेखों इत्यादि से उपयुक्त स्थन पर चुंनिन्दा पंक्तियां भी प्रमुखता से देते हैं हालांकि कभी कभी वह अनावश्यक भी प्रतीत होता है। कहानियों में व्यंग्य का भरपूर पुट देखा जा सकता है एवं कथानक का भाग बनकर कई कवितायेँ भी मौजूद हैं जो कि आम तौर पर किसी अन्य कथाकार कि शैली में दृष्टिगोचर नहीं होता। मानव जीवन कि दैनन्दिनी की मुश्किलें, पारस्परिक संबंधों की खींच तान, एवं प्रकृति का भी सुन्दर चित्रण यथास्थान किया है। कहानियों में गति है। मंथरता नहीं, पात्रों के माध्यम से कहे गए संवाद वही है जो उन हालत में हम आप, बोलते अतः बनावटीपन न होकर सत्यता दिखती है।
सामाजिक व्यवस्था पर भी उनकी नज़र है समाज में व्याप्त विषमताओं को भी अनदेखा नहीं किया है। जीवन के सुख दुःख, जीवन शैली, अनुभव, रिक्तता, सभी कुछ है एवं यूँ लगता है मानो उन्होंने अपने हर अनुभव को शब्दों का जामा पहना दिया हो। कोई लाग-लपेट नहीं है मात्र सच है। पात्र के मनोभावों को अनुभव करने एवं उन्हें व्यक्त करने कि अद्भुत प्रतिभा के वे धनी हैं। कह सकते है कि समाज को, उसकी घटनाओं को देखने का इनका चश्मा अलग ही है। जो किसी को नज़र नहीं आता वे उन मानवीय संवेदनाओं को गहराई एवं अत्यंत सूक्ष्मता से अन्वेषण कर एक रोचक कथानक बना देते हैं उसमें कहीं भी नीरसता नहीं है, हाँ कहीं न कहीं एक सन्देश अवश्य निहित है। जैसा कि मैने पहले भी कहा कि वही लेखन सफल है जिसमें पात्र पाठक एक हो जावें अर्थात पाठक पात्र में स्वयं को समझने एवं देखने लगे, इस दृष्टिकोण से मौर्य जी शतप्रतिशत सफल हुए है। उनकी कहानियां आरम्भ से अंत तक पाठक को बाँध कर रखती हैं क्यूंकि सरल, आसान आम बोलचाल कि भाषा में सहज बोधनीय वाक्यों संग इतना सजीव रोमांच निर्मित कर देते है कि अंत से पूर्व पुस्तक अत्याज्य हो जाती है।
पुस्तक के प्रारम्भ में ही विभिन्न कहानियों जैसे “सॉफ्ट कोर्नर”, “यात्रीगण कृपया ध्यान दें” पर पूर्व में प्रकशित समीक्षाओं के कुछ अंश दिए गए हैं अतः उन्हें दोबारा यहाँ लिखना सुधि पाठक के समय को नष्ट करना ही होगा फिर भी विशेष उल्लेख अंतर्गत कहना चाहूँगा कि “यात्रीगण कृपया ध्यान दें” हो या फिर “सॉफ्ट कार्नर” “लोहे कि जलियाँ” हो या “फुटपाथ पर जिंदगी”, प्रत्येक कहानी दूसरी से हटकर विषयवस्तु लिए हुए है रोचक है तथा लेखन की विशिष्ठ शैली सहज ग्राह्यता पाठन को रुचिकर एवं आनंद दायक बनाते हुए कुछ सोचने हेतु छोड़ देते हैं। जहाँ कहानी “चुभन” एक विवाहेत्तर प्रेम या आकर्षण संबन्धों पर रचित एवं चुभन शब्द को भिन्न रूपों में परिभाषित करती कहानी है वहीँ “इतवार का राग” सामान्य व्यक्ति की साधारण आकर्षण से ज़ुडी अल्प प्रेम भाव उपजाती कथा है। “पत्ता टूटा डाल से” पढ़ कर ज्ञात होता है कि जिसे हम मामूली बात समझते हैं वे उसमें कथानक कैसे देख लेते हैं इस के माध्यम से बड़ी ही सुन्दरता से अपनों से बिछुड़ने का दर्द कथानक में समेट दिया है एक अन्य कहानी “अनूठा प्रयोग” एक बच्चे को मुख्य पात्र के रूप में केन्द्रित कर एक छोटे से समारोह अंतर्गत उनके सूक्ष्म अवलोकन को दर्शाती है तो “जाड़े कि धूप” का अपना अलग ही मिजाज़ है जो स्वयं पड़ने से ही और ज्यादा बेहतर महसूस होता है। “ग्राहक कि दुविधा” में अत्यंत सूक्ष्म अवलोकन है छोटे दुकानदारों का तो वहीं ग्राहक के साथ ही दूकानदार कि मानसिकता का भी अच्छा विश्लेषण किया है।
अन्य कहानियां जिनका यहाँ उल्लेख नहीं कर पा रहा हूँ वे भी
अत्यन्य सधे हुए लहजे में अपने विशेष एवं भिन्न कथानक तथा विषयवस्तु के कारण अद्भुत
आनंद देती हैं तथा पाठक को अंत तक बिना किसी बोझिलता के पुस्तक से जोड़े रखने में
सक्षम हैं। हर कहानी भिन्न विषयवस्तु के साथ एक अनुपम, श्रेष्ठ
रचना है एवं यही कहूँगा कि बार बार पढने योग्य एक
संग्रहणीय पुस्तक है एवं अवश्य पढ़ें इसी अनुरोध के साथ,
सादर,
अतुल्य

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